शनिवार, 2 जनवरी 2010

धर्म एवं दर्शन के परम्परागत स्वरूप


aaj मनुष्य के अंदर एक महाअभाव व महादुःख की स्थिति बनी हुई aaj vah
परम्परागत मूल्यों पर विश्वास नहीं कर पा रहा है क्योंकि वे अविश्वसनीय एवं अप्रासंगिक हो गये हैं।
भौतिकवादी प्रगति एवं विकास के बावजूद मनुष्य सुखी नहीं है। वह मकान तो आलीशान बना पा रहा है मगर घर नहीं बसा पा रहा है।
परिवार के सदस्यों के बीच प्यार एवं विश्वास की कमी होती जा रही है। व्यक्ति की चेतना क्षणिक सुख में केन्द्रित होती जा रही है।

सम्पूर्ण भौतिक सुखों को अकेला ही भोगने की दिशा में पागल मनुष्य अन्तत: अतृप्ति का अनुभव कर रहा है।
नये युग को नये जीवन-मूल्य चाहिए। परिवर्तन सृष्टि का नियम है। संसार को अब ऐसे धर्म-दर्शन की आवश्यकता है जो मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, राजनैतिक समस्याओं का समाधान कर सके।

bhale hi vigyan की उपलब्धियों एवं अनुसंधानों ने मनुष्य को चमत्कृत कर दिया है। प्रतिक्षण अनुसंधान हो रहे हैं। जिन घटनाओं को न समझ पाने के कारण उन्हें अगम्य रहस्य मान लिया गया था वे आज अनुसंधेय हो गयी हैं।

तत्वचिन्तकों ने सृष्टि की बहुत-सी गुत्थियों की व्याख्या परमात्मा एवं माया के आधार पर की। इस कारण उनकी व्याख्या इस लोक का यथार्थ न रहकर परलोक का रहस्य बन गयी। आज का व्यक्ति उनके बारे में भी जानना चाहता है। अन्वेषण की जिज्ञासा बढ़ती जा रही है।


वैज्ञानिक विकास के कारण हमने जिस शक्ति का संग्रह किया है, उसका उपयोग किस प्रकार हो; प्राप्त गति एवं ऊर्जा का नियोजन किस प्रकार हो - यह आज के युग की जटिल समस्या है। विज्ञान ने हमें शक्ति, गति एवं ऊर्जा प्रदान की है।

parantu लक्ष्य हमें धर्म एवं दर्शन से प्राप्त करने हैं।

धर्म ही ऐसा तत्व है जो मानव मन की असीम कामनाओं को सीमित करने की क्षमता रखता है। धर्म मानवीय दृष्टि को व्यापक बनाता है। धर्म मानव मन में उदारता, सहिष्णुता एवं प्रेम की भावना का विकास करता है। समाज की व्यवस्था, शांति तथा समाज के सदस्यों में परस्पर प्रेम, सद्भाव एवं विश्वासपूर्ण व्यवहार के लिए धर्म का आचरण एक अनिवार्य शर्त है। मन की कामनाओं को नियंत्रित किये बिना समाज रचना संभव नहीं है। ज़िंदगी में संयम की लगाम आवश्यक है। कामनाओं को नियंत्रित करने की शक्ति या तो धर्म में है या शासन की कठोर व्यवस्था में। धर्म का अनुशासन 'आत्मानुशासन' है। शासन का अनुशासन हम पर 'पर का नियंत्रण' है।
धर्म संप्रदाय नहीं है। ज़िंदगी में हमें जो धारण करना चाहिए, वही धर्म है। नैतिक मूल्यों का आचरण ही धर्म है।

धर्म वह तत्व है जिसके आचरण से व्यक्ति अपने जीवन को चरितार्थ कर पाता है।
मध्ययुग में विकसित धारणाओं के swaroop aaj धर्म एवं दर्शन के prati व्यक्ति की आस्था कम हो गई है।

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